कडवा पाटीदार समाज की विशेषताएँ
  कडवा पाटीदार समाज खेती आधारित समाज है।
  समाज के अन्य वर्गों को साथ लेकर चलने वाला समाज है।
  जीभ से कडवा होने के बावजूद उदारदिल होते है।<
  प्रमाणिक, श्रमजीवी और कपटरहित है।
  गाँव में रहनेवाला समाज है।
  किसी का साथ हेता है तो अंत तक निभाता है।
  भूतकाल में सामान्य जीवन जीनेवाला तथा अपने समाज में ही विवाग करनेवाला समाज है।
  जीवन में चलेगा तथा होगा का विचार अपना कर विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है।
  वर्तमान समय में समूह लग्न अपना कर अन्य समाज को प्रेरणा देनेवाला समाज है।

कडवा पाटीदार समाज के जीवन के साथ जुडे कुछ तथ्य

यह समाज खेती आधारित होने के कारण निम्न बातों को जीवन के साथ अपनाया है।

हलोतरा (हल जोतना):-
खेती का मौसम नया वर्ष जेठ सुद बीज से शुरू होता है। बारिश के आने का दिन यानि हल जोतने का दिन। इस दिन सभी किसान हल बैल की पूजा कर खेत को जोतने का मुहुर्त करते है। किसान लापसी का भात खाते है। उनकी घरवाली घर से गाते हुए भात लेकर खेत में आती है और वहाँ सभी साथ में खाना खाते है। बैलों को भी अच्छा खाना दिया जाता है।

अपुजो (विशेष दिन जब बैलों को नही जोता जाता):-
कोई त्योहार या महिने में एक बार खेती काम में से छुट्टी रखी जाती है। इस दिन कोई भी किसान बैल पर हल नहीं चढ़ाता। माताजी के मेले के दो दिनों बसंत पचंमी तथा बैशाखी पूर्णिमा को अणुजो रखा जाता है।

पल्ली:-
यह माताजी की पूजा है। नवरात्री में बाजोट पर सात धान पका जाता है। आटे का दीया बनाकर गाने बाजे के साथ तालाब के किनारे जाकर रखा जाता है और प्रसाद बाँटा जाता है।

ढुंढिया देव:-
बरसात में देरी होने पर मिट्टी का ढुंढियाजेव बना कर औरतें उन्हें सिर पर रखकर गाते हुए घर घर घुमती है और ढुंढिया देव पर पानी डाला जाता है।

बाल विवाह:-
खेती आधारित समाज को विवाह के लिए समय नहीं था। प्रत्येक बारह वर्ष पर माताजी में से मुहूर्त निकलता उस दिन समग्र समाज में विवाह होता था जिसमें बाल विवाह विशेष रूप से होता था।

समूह लग्न:-
समय में बदलाव, सुधारवादियों का विरोध और बाल विवाह पर प्रतिबंध के कानून के कारण बाल विवाह बंद होने के कारण, समूह लग्न का नया विचार अमल में आया। समाज में गाँव में अनुकूलता के अनुसार एक मंडप में समूह लग्न होने लगा। आर्थिक फायदा भी होने लगा।

वनभोजन:-
कुलदेवी श्री उमिया माताजी - ऊंझा क्षेत्र के विस्तार के कडवा पाटीदारों के जीवन में वनभोजन का विशेष महत्व है। अधिकांश गाँव भाद्रपद या आश्विन माह में इस वनभोजन का आयोजन करते है। पूरा गाँव नाचते गाते गाँव के बाहर तालाब या नदी के किनारे किसी मंदिर के सानिध्य में जाकर आनंद उत्साह में रास गरबा व मंडलियों के साथ पूरा दिन बितता है। कुछ जगह घोड़ों की दौड भी होती है। दोपर का खाना वहीं बनाकर खाया जाता है। मंदिर में होम होता है। इस तरह एक धारा में चलने वाले जीवन में एक नवीनता आती है और लोग अपनी संस्कृति के अंग बने रहते है।

जेम के मोर पावो:-
जिसके घर पुत्र का जन्म होता है वे अपने पुत्र को जेम कराते है। फागुन में जब आम के पेडों पर मंजरी आते है तब यह दिन मनाया जाता है। लड़के की बुआ या बहन के द्वारा आम की मंजरी को पिलाने का खास उत्सव होता है। जिसके लड़के का यह आयोजन होता है वह अपने सगे संबंधी विशेषकर बुआ, लड़कियों तथा मामा मामी को निमंत्रण देते है तथा गीत गाकर इस उत्सव का आयोजन होता है।

पुत्र गरबा:-
जिसके घर में प्रथम पुत्र होता है वहाँ गरबा निकालने का रिवाज है जो अभी भी जारी है। नवरात्री में माताजी का गरबा निकाला जाता है। मिट्टी का, पित्तल का या कोई चांदी का भी गरबा बनाते है तथा रात को लड़के की मां, बहन तथा बुआ उसे माताजी के पूजा वाले चबुतरे में घुमाते है। इस अवसर पर सगे संबंधी को निमंत्रित किया जाता है तथा उत्सव मनाया जाता है।

माताजी का जातर:-
जिस घर में बच्चा नहीं हो रहा होता वह माताजी के जातर का बाधा रखता है। उनके घर में पुत्र का जन्म होता है। उनका गरबा की बाधा भी होती है और जातर खेलने की बाधा भी होती है। नायक (तरगाराओं - एक जाति) यह जातर खेलते है। उन्हें अपने घर बुलाकर रात को जातर खेला जाता है। गाँव के लोग उनका स्वागत करते है। जातर में माताजी का खेल खेला जाता है।

मुंडन:-
जिस घर में पुत्र को जन्म होता है उस बच्चे का बाल उतारने को मुंडन या बाल उतारना कहते है। यह कार्य माँ उमिया के स्थान पर होता है। इसके अलावा सामान्य रूप से उत्तर गुजरात में यह विधि बहुचराती माताजी के स्थान पर होता है। यदि अन्य किसी देवी देवता की मन्नत से संतान हुआ है तो यह विधि उनके स्थान पर होती है। इस विधि में अपने सगे संबंधी को बुलाया जाता है। इस विधि में निकाले गए बाल को संभालने का काम बुआ के द्वारा होता है।

करबटु:-
देवी शक्ति के आशीर्वाद के लिए उनके स्थान पर या गोत्र घर में बाधा के रूप में परंपरा से जो किया जाता है उसे करबटु कहते है। व्यक्ति कहीं भी रहता हो परंतु उसे करबटु को पूरा करने के लिए उसी स्थान पर जाना होता है। यह करबटु कहलाता है।

इस तरह ग्राम्य संस्कृति के साथ जुडा उपरोक्त सभी प्रसंग जीवन के भाग है। एक रूपसे चलने वाली जिंदगी में उत्साह उमंग तथा चेतना लाने के लिए धर्म के साथ सबको लिया गया है।

ऊंझा का स्थान - परिशिष्ट-2

 
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